किसी लत की तरह रगों में दौड़ता है तेरा एहसास
माना कुछ गहरा नहीं...
माना किसी से तुलनात्मक भी नहीं...
पर हाँ जगने लगी है आरजू तेरी
नींदे आज भी तेरी मुंतज़िर हैं...
अभी तो प्यार भी कुछ बेहतर नहीं हुआ तुझसे
बस तुझमे एक सुकून सा दिखता है..
या शायद यूँ कहूँ की तु मेरे ख्वाबों की हर हद तक मिलता है
तु मेरे ख्वाबों की हर हद तक मिलता है|
माना कुछ गहरा नहीं...
माना किसी से तुलनात्मक भी नहीं...
पर हाँ जगने लगी है आरजू तेरी
नींदे आज भी तेरी मुंतज़िर हैं...
अभी तो प्यार भी कुछ बेहतर नहीं हुआ तुझसे
बस तुझमे एक सुकून सा दिखता है..
या शायद यूँ कहूँ की तु मेरे ख्वाबों की हर हद तक मिलता है
तु मेरे ख्वाबों की हर हद तक मिलता है|
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