बस_यूँही
Something from the Depth of heart ...
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Tuesday, July 21, 2020
मुझे तुमसा और तुम्हें मुझसा कहांँ कोई मिल पाएगा
कमी नहीं है जमाने में बढ़ते हाथों की
बस फर्क इतना सा ही रह जाता है
मुझे तुमसा और तुम्हें मुझसा कहा कोई मिल पाता है।
गुजर तो जाती ही है जिंदगी
बस दिल के किसी कोने से
छीपे काश की कुछ आवाजें शोर करती
हजारों खुशियों में भी लम्हें भर की खालिश दे जाती है।
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