साँझ होते ही खूंटीयों पर टंग जाया करती थी
जाने कितनी रातों को चैन की नींदे सुलाया करती थी
सुबह की किरणों ने जब जब हमें जगाया तब तब वो हमारे खुशहाल से कल की खिड़की बन जाया करती थी...
हर रोज वो मच्छरदानी हमारे छोटे से परिवार का घरौंदा बन जाया करती थी |
जाने कितनी रातों को चैन की नींदे सुलाया करती थी
सुबह की किरणों ने जब जब हमें जगाया तब तब वो हमारे खुशहाल से कल की खिड़की बन जाया करती थी...
हर रोज वो मच्छरदानी हमारे छोटे से परिवार का घरौंदा बन जाया करती थी |
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