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Wednesday, August 7, 2019

काश तु सच्चा सा ख्वाब हो..

दो पर्दों के दरमियाँ छिपे हैं
दिल तो हमारे शायद फिर भी मिले हैं
संकोच लेकर इच्छाओं को रोके हैं
तु और मैं ऎसे ही सही पल भर की खातिर एक दूजे को तो सोचें है...
अब आगे का कुछ  जानते नहीं मिले तो अच्छा ना मिले तो समझेंगे तु शायद ख्वाब ही नहीं था सच्चा..

बस यूँ ही

जग बावरा हो उठे विचारों की मस्ती पे
मैंने तो बस मेरे अल्फाज़ दिये हैं
जाने कितने दफ़े हमने गुज़रे जमाने
बस यूँ ही रह रह कर याद किये हैं |

मच्छरदानी

साँझ होते ही खूंटीयों पर टंग जाया करती थी
जाने कितनी रातों को चैन की नींदे सुलाया करती थी
सुबह की किरणों ने जब जब  हमें जगाया तब तब वो हमारे खुशहाल से कल की खिड़की बन जाया करती थी...
हर रोज वो मच्छरदानी हमारे छोटे से परिवार का घरौंदा बन जाया करती थी |

Friday, August 2, 2019

आजकल लेख लिखते हैं

लम्हा दर लम्हा हर एक पल को कैद कर लेते हैं
कुछ पन्नो पर लिखते हैं तो कुछ के शब्द बदल देते हैं
इन शब्दों के मायने हर कोई अपनी ही तरह समझेगा
जैसी जिसकी सोच होगी वो वैसे ही मेरे विचारों की तुलना कर लेगा...

चेहरों की पहचान

चेहरों पर चेहरों के पहरे हैं
जो दिए गए और दे सकते हैं वो घाव बड़े ही गहरे हैं
ना फस इनके फरेबों में
ये तो बस तेरी राहों में कुछ पल को ही ठेहरें हैं

मौसम की कुछ बद- घुमानियाँ

रूहानी सा शमा है बदली बदली सी लगती इसकी फिज़ा है
हवाओं ने मेरे एहसास को कुछ इस कदर छुआ है
मानो कुदरत से मिली एक दुआ है ..
अजनबी  से सुरों को गुनगुनाने लगी हूँ इस कदर चलते चलते
मानो अकेली सी इन राहों ने सुकून का एक पल सा दिया है ..
चाँदनी आसमान मे छाने लगी है इस कदर
मानो सूरज की आखिरी किरणों से चाँद की चाँदनी को नया जन्म सा  मिला है |

तू घर सा है


बीते मौसम सा जो बदला नहीं वही पल सा है..
बेबुनियादी  सी बातें भी समझे वही मन सा है
अब इससे ज्यादा क्या कहूँ तुझे
कह दिया जब घर सा है..
परेशानी में सब प्रश्नों को सुलझा दे वही हल सा है...
जिसके होने से दिल हर पल खुश रहे वही रौनक सा है
क्यूँकि तू तो घर सा है |