जिदां होकर भी जब जिंदगी साथ ना हो तो आलम कुछ इस कदर बुरा होता है..
साँसे खलीश की घुटन और अक्श आंँखों को दगा दे जाते हैं।
चुभती है रैना अखियों में..
जानें कितने सवेरे तो कशमकश में ही हो जाते हैं ।
लफ्ज बोलकर कहेंगें एक दफा़..
कि इस आश में ना जाने कितनें जमांनें बैगानें हो जाते हैं।
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