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Friday, June 23, 2017

जिंदगी ।जिंदगी ।जिंदगी ।...

जिदां होकर भी जब जिंदगी साथ ना हो  तो आलम कुछ इस कदर बुरा होता है..
साँसे खलीश की घुटन और अक्श आंँखों को दगा दे जाते हैं।
चुभती है रैना अखियों में.. 
जानें कितने सवेरे तो कशमकश में ही हो जाते हैं ।
लफ्ज बोलकर कहेंगें एक दफा़..
कि इस आश में ना जाने कितनें जमांनें बैगानें हो जाते हैं।


Monday, June 12, 2017

ये तो बस शब्दों की माया है।

शब्द जो थमें थे लबों की खामोशी के पीछे।
करने लगे कुछ इस कदर बगावत सी
कि चुप्पी की चादर में मोहताज से हैं ।।
यूं तो दास्तान-ऐ-बयान किया करते थे किसी रोज ।
आजकल दिखतें कुछ खपाह् से हैं।।