कभी लिखते हैं कभी मिटाते हैं
ये शब्द कुछ ऐसे हैं जो तुमसे ब्यान ना कर पाते हैं...
इंतज़ार होता है पल पल का भारी जब तुमको ऑनलाइन देख ना पाते हैं ..
कुछ इस कदर छाया है दिल पर सुरूर तुम्हारी बातों का कि तुमसे बतिया कर मन ही मन गुदगुदाते हैं...
कभी लिखते हैं कभी मिटाते हैं...
कितने शब्दों को तो हम खुद तक ही रख जाते हैं ...
बस यूँ ही हर रोज जाने कितने अरमान हम दिल में छिपाते हैं |
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