भारत आज विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्रों में अग्रणी है, लेकिन लोकतंत्र की मजबूती केवल चुनावों से नहीं आती—वह आती है उन मुद्दों पर ईमानदार चर्चा से, जो सीधे नागरिकों के जीवन को प्रभावित करते हैं। दुर्भाग्य यह है कि कई बार राजनीतिक विमर्श ऐसे विषयों के इर्द-गिर्द घूमता रहता है जिनका देश की तात्कालिक चुनौतियों से कम ही संबंध होता है। वास्तविक समस्याएँ पीछे छूट जाती हैं, और जनता की आवश्यकताएँ अनसुनी रह जाती हैं।
सबसे बड़ी चुनौती है बेरोज़गारी, जिससे लाखों युवा प्रभावित हो रहे हैं। रोजगार के अवसर सीमित हैं, कौशल विकास अधूरा है और उद्योगों में स्थिरता की कमी युवा पीढ़ी के भविष्य को असुरक्षित बनाती है। इसके साथ ही महंगाई ने आम नागरिकों की कमर तोड़ दी है; रोजमर्रा की वस्तुओं के दाम बढ़ते चले जा रहे हैं।
स्वास्थ्य सेवाओं की कमी कई राज्यों में गंभीर रूप ले चुकी है। सरकारी अस्पतालों की स्थिति, उपकरणों की कमी और डॉक्टरों की अनुपलब्धता जनता को खतरों के बीच छोड़ देती है। इसी तरह शिक्षा की गिरती गुणवत्ता और अत्यधिक महंगी निजी शिक्षा लाखों परिवारों पर भारी बोझ बन चुकी है।
देश में आर्थिक असमानता भी लगातार गहराती जा रही है—जहाँ एक तरफ तेज़ विकास दिखता है, वहीं दूसरी तरफ बड़े वर्ग के पास मूल सुविधाएँ भी पर्याप्त नहीं हैं। पानी की कमी, जल प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन के प्रभाव कई राज्यों में अब एक गंभीर आपात स्थिति का रूप ले रहे हैं। ये केवल पर्यावरणीय मुद्दे नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के अस्तित्व से जुड़े प्रश्न हैं।
प्रतिदिन सड़क दुर्घटनाओं का एक बड़ा कारण है सड़कों की बदहाली, गड्ढे और अव्यवस्थित निर्माण। इस अव्यवस्था को और बढ़ाती है ट्रैफिक लाइट्स की कमी, जिसके कारण भीषण ट्रैफिक जाम और दुर्घटनाएँ आम हो चुकी हैं।
महिलाओं की सुरक्षा का प्रश्न आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना वर्षों पहले था। बदलते समय में डिजिटल सुरक्षा और डेटा प्राइवेसी भी अत्यंत महत्वपूर्ण मुद्दे बन गए हैं, क्योंकि साइबर अपराध लगातार बढ़ रहे हैं।
कृषि क्षेत्र देश की रीढ़ है, लेकिन किसान कम आय, अनिश्चित मौसम, बढ़ती लागत और बाज़ार की अस्थिरता से जूझ रहे हैं। इसके साथ ही मानसिक स्वास्थ्य संकट तेजी से बढ़ रहा है, परंतु समाज में इसके प्रति जागरूकता और संवेदनशीलता अब भी पर्याप्त नहीं है।
सामाजिक ताने-बाने पर भी नई चुनौतियाँ उभर रही हैं—धार्मिक कट्टरता, बढ़ती असहिष्णुता और सामाजिक तनाव एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए खतरा बन सकते हैं। वहीं युवाओं में नशाखोरी और शराब की लत परिवारों और समाज दोनों को गहरी चोट पहुँचा रही है।
इन सभी समस्याओं का सीधा असर देश की प्रगति, स्थिरता और सामाजिक समरसता पर पड़ता है। इसलिए आवश्यक है कि देश की संसद, विधानसभाएँ, नीति निर्माता और समाज—सभी इन मुद्दों पर गंभीर, रचनात्मक और समाधान-केंद्रित चर्चा करें।
लोकतंत्र तभी सार्थक होगा जब उसकी प्राथमिकता जनता की समस्याएँ हों।
और जनता की समस्याओं की सूची बहुत स्पष्ट है:
रोज़गार, महंगाई, स्वास्थ्य, शिक्षा, सुरक्षा, पर्यावरण, सड़कें, किसान, पानी, मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक सौहार्द।
देश को आज राजनीति से अधिक समाधानों की आवश्यकता है।
जिम्मेदारी सभी की है—सरकार, विपक्ष, संस्थाएँ और नागरिक।
सच्चा विकास वही है, जो सबसे अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे।
वही भारत की असली पहचान है और वही हमारे लोकतंत्र की असली शक्ति।
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