मेरी बेबसी के किस्से क्या सुनाऊं ओ साहब
सुबह की पहली किरण के आते ही
रोटी धूंडने निकल जाता हूं।
हर रोज ख्वाब पूरे होंगे मेरे अपनों के
जाने कितने सपने सजाता हूं ।
खुशियों का बाज़ार ला सकूं जब भी लोटूं
हर रोज बस यही दुआ मांग जाने कितनी चोटें खाता हूं।
अपनों के सपनों को पूरे कर अपने सपनों को पूरा पाता हूं।
लोग मजदूर नाम से जानते है मुझे
पर मेरी मजबूरी तो मै ही समझ पाता हूं।